Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
दश तस्याभवन्पुत्रा जगतो दिक्तटा इव ।
महाशया महात्मानो महतामास्पदं सताम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वभाववादी चार्वाक के मत का निराकरण करते हैं।
अंकुरादि स्वभाव का काल, खेत, जलादि सहित स्वभाव कारण है ऐसी चार्वाकों की उक्ति है।
बीज और स्वभाव इन दो पदों के अर्थ में पार्थक्य न होने से 'अकुंरस्वभावस्य” इस स्वभावपद में
षष्ठ्यर्थ का सम्बन्ध प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिए दोनों के पर्याय होने के कारण दोनों का साथ प्रयोग
नहीं हो सकता अत: यह कल्पना व्यर्थ हे