Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
स तेषां कालवशतः पिताऽन्तर्धिमुपाययौ ।
दशानां भगवान् रुद्र एकादश इव क्षये ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इससे परिशेषात् हमारा सिद्धान्त सिद्ध हुआ, यों दिखलाते है।
इसलिए सब पदार्थ और उनके कारण ये सब अज्ञानी में निष्कारण भ्रान्ति ही हे । तत्त्वज्ञ में तो
सन्मात्ररूप से स्थित ही कार्य सन्मात्ररूप कारण से ही चित् के चमत्काररूप से आविर्भूत होता है और
तिरोहित होता है, उससे अतिरिक्त अणुमात्र भी नहीं है, यह भाव है