Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
तस्यानुगमनं चक्रे भार्या वैधव्यभीतिभिः ।
अनुरक्ता दिनस्येव संध्या ताराविलोचना ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव ज्ञानी को अकृत करोड़ों अपराधों से भी मन में दुःख नहीं होता, ऐसा कहते हैं।
जैसे स्वप्न में डाकुओं द्वारा किया गया वध, बन्धन आदि प्रबुद्ध पुरुष को स्वप्न मिथ्यात्व का ज्ञान
होने से दुःखदायी नहीं होता वैसे ही तत्त्वज्ञान के अनन्तर जीवन भी दुःखप्रद नहीं होता