Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
तयोस्ते तनया दुःखकलिता विपिनं गताः ।
कृतौर्ध्वदेहिकास्त्यक्त्वा व्यवहारं समाधये ॥ ३२ ॥
धारणानां समस्तानां का स्यादुत्तमसिद्धिदा ।
धारणा यन्मयाः सन्तः स्याम सर्वेश्वरा वयम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टि
के आदि में उत्पन्न नहीं हुआ यह दृश्य चिदाकाशस्वरूप स्वप्न के तुल्य भासता है, इसलिए इसमें अन्य
(दुःख) और दुःख के कारण की उपपत्ति नहीं होती है। इस युक्ति के सिवा और कोई कल्पना युक्तियुक्त
नहीं दिखाई देती, इसलिए यह जगत्कल्पना ब्रह्मानुभूति ही है, यह अर्थ है