Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 178, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 178, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 178 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
इति ते तत्र संचिन्त्य बद्धपद्मासना दश ।
इदं संचिन्तयामासुर्निर्विघ्ने कन्दरोदरे ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे शुद्ध
जलराशि में लहर, भँवर, द्रवता आदि भासते हैं वैसे ही ब्रह्म में यह सर्गपर्याय (सर्गापरनामक) ब्रह्म
भासता है