Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवं चिन्मात्रमेवैकं शुद्धं सत्त्वं जगत्त्रयम् ।
संभवन्तीह भूतानि नाज्ञबुद्धानि कानिचित् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
धर्म आदि अमूर्त होने के कारण परलोक मे मूर्त देह के कारण नहीं हो सकते यह कथन सुनकर
अमूर्त चिदात्मा द्वारा मूर्त देह आदि के चालन में युक्ति की जिज्ञासा कर रहे श्रीरामचनद्रजी उसकी
अनुपपत्ति दिखलाने के लिए भूमिका बोधते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, त्रैलोक्य में मूर्त ओर अमूर्तं भेद से दो प्रकार के पदार्थ हैं जिनमें से
कुछ सप्रतिघ (आपस में टकरानेवाले) हैं और कुछ अप्रतिघ (आपस में न टकरानेवाले) हैँ । भाव यह
कि यहाँ पर मूर्त अमूर्त ब्रह्मरूप से दिखलाया गया विभाग अभीष्ट नहीं है, किन्तु प्रतिघात की योग्यता
ओर प्रतिघात की अयोम्यतारूप उपाधि द्वारा कृत विभाग अभिप्रेत है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठहत्तरवाँ सर्ग इस सर्ग में अमूर्तं (निराकार) चित् द्वारा समूर्तं (साकार) जगत् के परिचालन में युक्तिवर्णनपूर्वक एेन्दवाख्यान से जगत् अमूर्तं चिन्मात्र ही है, यह सिद्ध किया गया है ।