Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तस्मात्कुतः शरीरादि वस्तु सप्रतिघं कुतः ।
यदिदं दृश्यते किंचित्तदप्रतिघमाततम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
फूल, कपास (रु), मक्खन आदि अत्यन्त कोमल पदार्थ कठिन शिलाओं की नाई प्रतिघात के
(टक्कर के) योग्य नहीं हैं, अतः उनमें कोई अमूर्तता न न समझ जाय इसलिए सप्रतिघ, अप्रतिघ आदि
विशेषणो के तात्पर्य का अलग अलग लक्षणों से उद्घाटन करते हैं ।
यहाँ अप्रतिघ उन्हें कहते हैं, जो परस्पर टकराते नहीं है और सप्रतिघ उन्हें कहते हैं जो परस्पर
टकराते हैं