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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

स्थितं चिद्व्योम चिद्व्योम्निशान्ते शान्तं समं स्थितम् । स्थितमाकाशमाकाशे ज्ञप्तिर्ज्ञप्तौ विजृम्भते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी बात को लोकप्रस़िद्धि से स्पष्ट करते हैं। लोक में सप्रतिघ पदार्थो का तो परस्पर टकराना दिखलाई देता है, किन्तु अप्रतिघरूप किन्हीं पदार्थों का किंचिंत्‌ भी आपस में टकराना नहीं दिखाई देता