Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
एकस्याः संविदः स्वप्ने यथा भानमनेकधा ।
नानापदार्थरूपेण सर्गादौ गगने तथा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीरामजी की ओर से आक्षेप होने पर श्रीवसिष्ठजी पूर्वोक्त गुढाभिसन्धिवाला उत्तर
भी वासनाओ को बाहरी और भीतरी परिच्छेदरूप भ्रान्तिमूलक होने से वह अनवस्थाग्रस्त, सूक्ष्म
विचार करने पर न टिकनेवाला है यों श्रीरामचन्द्रजी उसे समझ गये हैं पुनः मैं उनको दुहराऊँगा तो
श्रीरामचन्द्रजी उसका अवश्य खंडन करेंगे यों सोचते हुए उस उत्तर की उपेक्षाकर सिद्धान्त के
अवलम्बन से ही एक उक्ति से सबका समाधान करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सकल सन्देहरूपी वृक्षों की जड़ तत्त्व वस्तु का
अज्ञान ही है, अतएव सब वस्तुओं के एकतानुभवरूप तत्त्वसाक्षात्कार की अनुभूति के लिए उक्त
सन्देहरूपी वृक्षों की जड़ खोदनेवाला कानों को भूषणो के समान आनन्द देनेवाला यह वचन आप
सुनिये