Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 21–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verses 21–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 21-25
संस्कृत श्लोक
बहुदीपे गृहे च्छाया बह्वयो भान्त्येकवद्यथा ।
सर्वशक्तेस्तथैवैका भाति शक्तिरनेकधा ॥ २१ ॥
यत्सीकरस्फुरणमम्बुनिधौ शिवाख्ये व्योम्नीव वृक्षनिकरस्फुरणं स सर्गः ।
व्योम्न्येष वृक्षनिकरो व्यतिरिक्तरूपो ब्रह्माम्बुधौ न तु मनागपि सर्गबिन्दुः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी, आपने जो अनेक आक्षेप किये हैं वे लागू हो सकते यदि हम प्रपच को
सप्रतिघ ओर यथार्थ मानते । हमारे मत में यहाँ कहीं पर भी कोई वस्तु सप्रतिच हे ही नहीं । यह सभी
कुछ प्रपंच सदा शान्त अप्रतिघ ही सब ओर व्याप्त है । स्वप्न ओर संकल्पो की तरह पृथिवी आदि
सब पदार्थराशि शुद्ध संवित्मय शान्त अप्रतिघरूप है । कारण का अभाव होने से यह सब प्रपंच आदि
में और अन्त में नहीं है, जैसे स्वप्न में स्थित चित् का पर्वत, नदी, नगर आदि के रूप में भान होता
है वैसे ही वर्तमान सृष्टि भी भ्रान्तिरूप ही है । इसलिए तत्त्ववेत्ता लोग विवेक, वैराग्य, त्याग, श्रवण,
मनन, निदिध्यासन आदि प्रयत्न से साध्य कारणों से वासना सहित मूर्ताकार को हटाकर द्युलोक,
पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदी, दिशा आदिरूप जगत् को अप्रतिघ बोधमात्र ही जानते हैँ । हे
श्रीरामचन्द्रजी, आप अन्तःकरण, भूत आदि तथा मिट्टी, काठ, पत्थर आदि सबको शून्य ओर चेतन
को अशून्य समञ्चिये चेतन के सिवा अन्य अशून्य नहीं है