Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 26
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हिन्दी अर्थ
चिन्मात्र ही सर्व जगत् है, मूर्त कुछ भी नहीं है, इस विषय में पूर्वोक्त एन्दवाख्यान को पुनः सुनाने
के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
इस विषय में कानों को भूषित करनेवाले इसी प्रकार के एेन्दवाख्यान को आप सुनिये । मैंने पहले
उत्पत्ति प्रकरण में मनोमात्र ही जगत् है यह दिखलाने के लिए वह आख्यान कहा था यहाँ पर चिन्मात्र ही
जगत् है यों निर्वाण-निष्कर्ष के लिए उसे कहता हूँ