Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 27
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
प्रस्तुत प्रश्न के पूर्णतया समाधानरूप प्रयोजनभेद से भी इसकी पुनरुक्ति दोषावह नहीं है, यह
कहते हैं।
प्रस्तुत प्रश्न के बोध के लिए फिर भी उसे आप सुनें । जिससे कि यह सब पर्वतादि जगत् अमूर्त
चित् ही है इस प्रश्न का समाधान आपको विदित हो जायेगा