Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 57
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हिन्दी अर्थ
अतएव तृण, काष्ठ, शैल आदि को अचेतन समझनेवाले मूढ़ों का विद्वान् लोग उपहास करते हैं,
ऐसा कहते हैं।
जो संवित्मय (चिन्मात्र) पर्वत आदि जगत् में स्थित हैं उनको अचिन्मय कहनेवाले अज्ञ का अभिज्ञो
द्वारा उपहास किया जाता हे