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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 58

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा के संकल्प से जन्य होने के कारण भी अपने मनोराज्य के तुल्य जगत्‌ की चिन्मात्रता का अनुमान करना चाहिये, ऐसा कहते हैं। जैसे आत्मा संकल्पमय इन जगतों को आकाश में चिदाकाशात्मक जानता है वैसे ही ब्रह्मा के संकल्प से उत्पन्न यह जगत्‌ भी चिदाकाशात्मक ही है