Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 179, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
संवित्करौ शिरः संवित्संविदिन्द्रियवृन्दकम् ।
शान्तमप्रतिघं सर्वं न सप्रतिघमस्ति हि ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि आशय में स्थित मूर्त प्राणवायु ही प्रवेश और निर्गमरूप वृत्तियों से क्षुब्ध होकर देह को
प्रवृत्त करता है यह कहा जा सकता है तथापि हे प्रभो, उसमें प्रवेश-निर्गममय क्षोभ कौन पैदा करता
हे ? यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये