Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
सभूतान्यम्बरोर्व्यादिवृन्दानि त्रिजगन्त्यपि ।
उह्यन्ते चाप्यरूढानि पुरः सर्वत्र गन्धवत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
चार प्रकार के प्राणियों
के तथा आकाश, पृथिवी आदि समूहों के सहित अप्रतिष्ठित ये तीनों लोक भी एक देश से
दूसरे देश में ऐसे सर्वत्र मेरे सामने उडाये जा रहे हैँ, जैसे कि गन्ध