Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र सर्वदा सन्ति सुसूक्ष्माण्येव खादपि ।
कल्पनामात्रसारत्वान्न चोह्यन्ते मनागपि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश से भी अत्यन्त सूक्ष्म संकल्पकल्पित ये मनोमय जगत्
सब जगह सर्वदा ही हैं और कल्पनामात्र सार होने से तनिक भी कहीं नहीं पहुँचाये जाते
हैं