Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सौरभाणि समुह्यन्ते वाताङ्गस्थानि राघव ।
जगन्ति प्राणसंस्थानि व्योमात्मकमयानि तु ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राघव, जैसे
वायु में स्थित सुगंध इधर-उधर ले जायी जाती हैं वैसे ही प्राणवायु में स्थित आकाशात्मक
जगत् भी इधर-उधर ले जाये जाते हैं