Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कुम्भे देशान्तरं नीते यथान्तर्व्योन्नि नान्यता ।
स्पन्दनादिमये चित्ते तथैव त्रिजगद्भ्रमे ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि तीनों जयत् के श्रमरूप से विक्त मे स्यन्दन और भेद रहने पर भी आत्मा में
स्यन्दन और भेद नहीं है, यह कहते हैं ।
घट को देशान्तर में पहुँचा देने पर भी जैसे घट के अन्तर्गत आकाश में कोई भेद नहीं है, वैसे
ही स्पन्दनमय चित्त में तीनों जगत् का भ्रम रहने पर भी आत्मा में स्पन्दन और भ्रम नहीं है