Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
असत्येव स्वरूपेऽस्मिञ्जगदाख्ये विदो भ्रमे ।
लोकान्तराधर्ममयी सा बृंहगस्य भावना ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
छोटे में बड़े का समावेश वस्तुतः नहीं हो सकता; भ्रान्ति से तो हो ही सकता हैं, इस आशय
से कहते हैं ।
अज्ञान से आवृत चिति के जगन्नामक भ्रम में असद्रप ही पदार्थ में जीवित को यह लोक,
मृत को परलोक तथा उनमें धर्माधर्म फल की जो कल्पना है वह वृद्धिदशा को प्राप्त चित्त की
संकल्परूप एकमात्र भावना ही है । इसका तात्पर्य यह है कि भावना को वस्तु का अन्यथा भाव
रोक नहीं सकता