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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

इदं हेयमुपादेयमिदमित्यन्तरज्ञता । यस्य तस्य भवायास्ति सर्वज्ञस्यापि मूढता ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

यूर्खों को भीतर-भीतर जयद्श्रम की भावना बनी रहे, कड हानि नहीं; परन्तु आप-जेस़े सर्व महानुभावों को भला भीतर- भीतर एक जगद्‌ के पीछे दूसरा जगत्‌ विद्यमान है, यह भ्रान्ति केसे, इस शका पर कहते हैं । यह वस्तु हेय है और यह वस्तु उपादेय है, इस तरह की भेदभरी अज्ञता जिसके अन्दर उपस्थित है, सर्वज्ञ होते हुए भी उस पुरुष की, व्यवहार चलाने के लिए जब तक प्रारब्ध का बिलकुल क्षय नहीं हो जाता तब तककुछ-न-कुछ, मूढता उसके पीछे लगी ही रहती है