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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सचेतनो ह्यवयवी चेतत्यवयवान्यथा । स्वान्तरेव ततं जीवस्त्रिजगद्बुध्यते तथा ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण हैं कि सर्वजन रहते हुए भी समष्टिजीवात्मक हिरण्यगर्भ को अपने अवयवो की नाई भीतर में ही तीनों जगत्‌ का दर्शन होता है, यह कहते हैं / जैसे सचेतन लौकिक व्यष्टिपुरुष अपने हाथ, पैर आदि अवयवों का अपने भीतर ही अवलोकन करता है, वैसे ही समष्टिजीवात्मक हिरण्यगर्भ भी अपने ही भीतर व्याप्त तीनों जगत्‌ का अवलोकन करता है