Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
संविदात्मपराकाशमनन्तमजमव्ययम् ।
व्योम्नोऽवयवरूपाणि तस्येमानि जगन्ति भोः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु माया उपहित ईश्वर ही इस तरह देखता है, यह कहते हैं /
हे श्रीरामजी, संविदात्मक, परमाकाश अनन्त, अज एवं अविनाशी ईश्वर है । उसी माया
उपहित परमाकाशरूप ईश्वर के अवयवस्वरूप ये समस्त जगत् है