Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
सचेतनोऽयःपिण्डोऽन्तः क्षुरसूच्यादिकं यथा ।
बुद्ध्यते बुद्ध्यते तद्वज्जीवोऽज्ञस्त्रिजगद्भ्रमम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रलयकाल मे इश्वर अपने अन्तर्गत समस्त जग्रत् को केसे देखता है / इस आशंका पर
कहते हैं।
यदि लोहे का गोला सचेतन हो, तो वह भी अपने अन्दर सूक्ष्मरूप से स्थित छूरे, सुई, कैंची
आदि अपने भावी विकार को जैसे देख सकता है, वैसे ही समष्टिजीवात्मक ईश्वर भी अपने में लीन
किये समस्त संस्कारों से समन्वित होकर तीनों जगत् के भ्रम को देखता है