Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
अचिच्चिद्वापि मृत्पिण्डः शरावोदञ्चनादिकम् ।
यथाङ्ग मनुते जीवस्तथाङ्ग मनुते जगत् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिष्ठान सद्रूप
की प्रधानता से चिति या आरोपित मिट्टी आदिरूप के प्राधान्य की विवक्षा से अचितिरूप मिट्टी का
पिण्ड सकोरा आदि को जैसे अपना अंग मानता है वैसे ही सृष्टिजीवरूप ईश्वर भी जगत् को अपना
अंग मानता है