Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
चिदचिद्वाङ्कुरो देहे वृक्षत्वं मन्यते यथा ।
वृक्षशब्दार्थरहितं ब्रह्मेदं त्रिजगत्तथा ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
उपहित के प्राधान्य से चिति या आरोपित मिट्टी आदिरूप के प्राधान्य से
अचितिरूप अंकुर अपनी देह में जैसे वृक्षत्व मानता है, वैसे ही वृक्ष शब्दार्थ से रहित ब्रह्म इन तीनों
लोकों को अपने में ही बाधित मानता है (भः)