Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

देशकालक्रियाद्रव्यमात्रमेव जगत्त्रयम् । अहंत्वजगतोस्तेन भेदो नास्त्येतदात्मनोः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह श्रीरामचन्द्रजी के प्रश्नों का समाधान देकर ग्रास्रंगिक सभी बातें समाप्तकर, नाहन्त्वजयती भिन्ने पवनस्यन्दने यथा“ इल पूर्व प्रस्तुत अर्थ का प्रकादान्तर से समर्थन करने के लिए अनुसन्धान करते हैं / हे श्रीरामजी, देश, काल, क्रिया तथा द्रव्यरूप ही ये तीनों जगत्‌ हैं और अहंकार भी इन देश, (५) विशेषता यही है कि जीवसंस्कारउपहितरूप से वृक्षशब्दादिसहित ब्रह्म अपने को मानता है तथा जीवसंस्कार से अनुपहित ईश्वररूप से वह अपने को वृक्ष शब्दादि के अर्थ से रहित यानी अनादि सिद्ध विद्या से बाधित मानता है । (&) देखिये श्रुति-'यत्र नान्यत्पश्यति" इत्यादि। कालादि के साथ अभेद सम्बन्धाभिमान रखने के कारण देश, कालादि रूप ही हे, अतः देश- कालादिरूप जगत्‌ ओर अहंकार इन दोनों में भेद नहीं है