Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
अमुञ्चतः पराणुत्वं जीवस्यैतत्स्मृतं वपुः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ यह स्थावर-जंगमरूप जगत्
दिखाई दे रहा है वह सब अपनी वास्तविक ब्रह्मभावरूप परमसूक्ष्मता का त्याग न कर रहे जीव का
विवर्तरूप स्थूल शरीर ही है