Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verses 11–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 180, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 11-13
संस्कृत श्लोक
श्रीपर्वतमखण्डेहं कदाचित्प्राप्तवानहम् ।
तत्रावसं चिरं कालं मृदु दीर्घं तपश्चरन् ॥ ११ ॥
तत्रास्त्यरण्यं विदितं मुक्तं तृणवनादिभिः ।
त्यक्ततेजस्तमोभ्रादिभूमाविव नभस्तलम् ॥ १२ ॥
तत्रास्ति मध्ये विटपी लघुः पेलवपल्लवः ।
स्थित एषोऽम्बरे शून्ये मन्दरश्मिरिवांशुमान् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
मायावाद में तो सब अविरुद्ध है, यह कहते है ।
नाना ओर अनानारूप स्वत्मिक ब्रह्मपद में यथार्थ में बिना कारण के कार्यो की सत्ता स्थित है और
कल्पितरूप से कारणजन्य भी सत्ता है । एक भी सहस्र हो जाता है जैसे कि ये एेन्दव संकल्पजनित
जगतो के समूहों के साथ लाखों भूत बन गये वैसे ही हजारों संवित् भी एक हो जाती हैं क्योकि सायुज्य
मुक्ति में सब सृष्टियों के साथ विष्णु आदि का (आदि से ब्रह्म, रुद्र, चन्द्र, इन्द्र, सूर्य आदि ग्रहण करना
चाहिये) एक शरीर होता है