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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 180, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

तत्राहं ब्राह्मणो जातः प्राप्तविद्यश्च संस्थितः । कुन्दावदातदन्तत्वात्कुन्ददन्त इति श्रुतः ॥ ९ ॥ अथाहं जातवैराग्यः प्रविहर्तुं प्रवृत्तवान् । देवद्विजमुनीन्द्राणां संभ्रमाच्छ्रमशान्तये ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

युक्तिद्रष्टि से तो कारण के बिना उत्पन्न संवित्‌रूप लब्ध यह जगत्‌ न तो अत्यन्त असत्‌ है ओर न अत्यन्त सत्‌ है किन्तु सद्रत्‌ है, यह कहते हैं। कारण के बिना कार्य सद्वत्‌ सिद्ध होता है । संभावना के अनुसार ही अर्थ को संवित्‌ निस्सन्देह प्राप्त करती हे जैसे स्वप्न मेँ चिन्मय आत्मा के सर्वरूप होने से सब कुछ का सर्वत्र सर्वथा संभव है वैसे ही जाग्रत्‌ में भी चैतन्मय होने से ब्रह्म की सर्वात्मरूपता का संभव है