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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verses 15–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 180, verses 15–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 15-20

संस्कृत श्लोक

मौञ्जदामनिबद्धोर्ध्वपादो नित्यमवाक्शिराः । अष्ठीलत्वं दधदिव महाष्ठीलस्य शाल्मलेः ॥ १५ ॥ दृष्टः प्राप्तेन तं देशं स कदाचिन्मया पुमान् । विचारितो निकटतो वक्षःस्थाञ्जलिसंपुटः ॥ १६ ॥ यावज्जीवत्यसौ विप्रो निःश्वसित्यहताकृतिः । शीतवातातपस्पर्शान्सर्वान्वेत्ति च कालजान् ॥ १७ ॥ अनन्तरमसावेको नोपचर्य मया बहून् । दिवसातपखेदेन विश्रम्भे पातितः शनैः ॥ १८ ॥ पृष्टश्च कोऽसि भगवन्किमर्थं दारुणं तपः । करोषीदं विशालाक्ष लक्ष्यालक्ष्यात्मजीवितः ॥ १९ ॥ अथ तेनोक्तमर्थस्ते क इवानेन तापस । अर्थे नातिविचित्रा हि भवन्तीच्छाः शरीरिणाम् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

व्याघ्रादि के भय की तरह परिज्ञात होते ही यह सम्पूर्णं तथा शान्त हो जाता है । एक ही संवित्‌ का स्वप्न में जिस प्रकार अनेकरूप से भान होता है उसी प्रकार सृष्टि के आदि में एक ही संवित्‌ का चिदाकाश में नाना पदार्थरूप से भान होता हे