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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 180, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

दीर्घाध्वना परिश्रान्तः सयत्न इव लक्ष्यसे । वदाद्य वदतां श्रेष्ठ कुत आगमनं कृतम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

देह, उसके अवयव आदि प्रबुद्ध (जागे हुए) पुरुष की दृष्टि से स्वप्न शरीर के समान चिन्मात्र ही हैं इसलिए उनमें समूर्तता की शंका अज्ञानी की दृष्टि से ही हो सकती है तात्तविक दृष्टि से नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। देह के अवयव कहाँ है, कहाँ आँतड़ियाँ हैं, कहाँ अस्थिपंजर (कंकाल) है आकाश के समान अमूर्त देह को आप स्वप्नदेह के समान समूर्त जानिये