Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 180, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 180, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 180 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
ब्राह्मण उवाच ।
एवमेतन्महाभाग सुमहायत्नवानहम् ।
यदर्थमागतोऽस्मीह तस्याकर्णय निर्णयम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से सिद्ध मूर्त शरीर आदि का अपलाप केवल साहस ही है यह समझना ठीक
नहीं, ऐसा कहते है ।
हाथ संवित् (चिन्मात्र) हैं, सिर संवित् है, सब इन्द्र्यो संविद्रूप हैं सब कुछ शान्त अमूर्त है, समूर्त
कुछ भी नहीं है। सहेतुक प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध भी मूर्तता अहेतुक प्रमाणवाली और सकारण भी
अकारण हे, क्योकि "तस्य त्रय आवस्थास्त्रय: स्वप्नाः", “नेह नानास्ति किंचन, “यत्र नान्यत् पश्यति
नान्यच्छृणोति", "अथात आदेशो नेति नेति" इत्यादि श्रुतियों से ही जगत् का अपलाप किया जाता
है