Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 10–16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 181, verses 10–16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 10-16
संस्कृत श्लोक
गच्छावोऽत्राश्रभे गौर्या मुनिमण्डलमण्डिते ।
भ्रातरो मे स्थिताः सप्त वनेष्वेवमिवार्थिनः ॥ १० ॥
भ्रातरोऽष्टौ वयमिमे जातानेकतया तया ।
एकसंविन्मया जाता एकसंकल्पनिश्चयाः ॥ ११ ॥
तेन तेऽप्यत्र तपसे स्वनिश्चयसमाश्रयाः ।
स्थिता आगत्य विविधैस्तपोभिः क्षपितैनसः ॥ १२ ॥
तैः सार्धं भ्रातृभिः पूर्वमागत्याहमिहावसम् ।
षण्मासानाश्रमे गौर्यास्तेन दृष्टो मयैष सः ॥ १३ ॥
पुष्पखण्डतरुच्छायासुप्तमुग्धमृगार्भकः ।
पर्णोटजाग्रविश्रान्तशुकोद्ग्राहितशास्त्रदृक् ॥ १४ ॥
तद्ब्रह्मलोकसंकाशमेहि मुन्याश्रमं श्रिये ।
गच्छावोऽच्छतरं तत्र चेतः पुण्यैर्भविष्यति ॥ १५ ॥
विदुषामपि धीराणामपि तत्त्वविदामपि ।
त्वरते हि मनः पुंसामलंबुद्धिविलोकने ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके उपरान्त हृदय में वैराग्यवान् हुआ मैं भ्रान्ति से उत्पन्न संसार क्लेशो की निवृत्ति के लिए देवता,
द्विज ओर मुनीन्द्रो के स्थानों में भ्रमण करने में प्रवृत्त हुआ। इसी प्रकार घूमता हुआ मैं कभी श्रीपर्वत पर
जा पहुँचा ओर वहाँ चिरकाल तक मृदु (अतीक्ष्ण) तथा दीर्घकालीन तपस्या करता हुआ अखण्ड
चेष्टापूर्वक रहा । उस श्रीपर्वत में तृणवन आदि से विहीन एक ऐसा वन प्रसिद्ध है जो भूमि में तेज, तम,
बादल आदि से रहित (अर्थात् केवल शून्य) आकाश-सा है। उस वन के मध्य में एक कोमल पल्लवोवाला
छोटा-सा वृक्ष इस प्रकार स्थित है जैसे शून्य आकाश में मन्दकिरण सूर्य स्थित हो । उस वृक्ष की शाखा
में एक पवित्र आकृतिवाला पुरुष रस्सी से बँधा हुआ लटक रहा था मानों भानु ही अपनी रश्मियों से पैर
बाँधकर लटकता हो मूँज की रस्सी के ऊपर की ओर बधि हुए पैरौवाला नित्य नीचे को लटके सिरवाला
वह बड़ी बड़ी गाँठोंवाले शाल्मलिवृक्ष की अष्ठीलता को (लम्बायमान पर्वग्रन्थिता को) धारण करता
हुआ-सा स्थित था। भ्रमण करते करते उस देश को प्राप्त हुए मैंने वक्षस्थल में अंजलि बोधकर प्रणाम
करते हुए उस पुरुष को देखा ओर उसके निकट जाकर विचार किया