Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 23–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 181, verses 23–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 23-26
संस्कृत श्लोक
ततश्चिरेण कालेन मयोद्वेगेन चापलात् ।
उक्तं मुने प्रबुध्यस्व ध्यानादित्युच्चकैर्वचः ॥ २३ ॥
शब्देनोच्चैर्मदीयेन संप्रबुद्धोऽभवन्मुनिः ।
सिंहोऽम्बुदरवेणेव जृम्भां कृत्वाभ्युवाच च ॥ २४ ॥
कौ भवन्ताविमौ साधू क्वासौ गौर्याश्रमो गतः ।
केन वाहमिहानीतः कालोऽयं कश्च वर्तते ॥ २५ ॥
तेनेत्युक्ते मयाप्युक्तं भगवन्विद्धि ईदृशम् ।
न किंचिदावां बुद्धोऽपि कस्माज्जानासि न स्वयम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
उन शास्त्रों में मैंने सुना कि राजा समग्र भोगसामग्री का आश्रय होता है अर्थात् सम्पूर्ण
एश्वर्य का उपभोक्ता होता है। नवयौवन भोग का इच्छुक होता ही है। ऐसा सुनने के अनन्तर सप्तमहाद्वीपों
में विस्तृत इस पृथ्वी का पति और उदारात्मा (याचकों की सारी अभिलाषाओं को पूर्ण करने में समर्थ)
होऊँ ऐसी मैं चिरकाल तक इच्छा करता रहा। इसी प्रयोजन से इस देश में आकर के इस प्रकार मैं स्थित
हूँ और हे मानद, मेरे यहाँ बारह वर्ष बीत गये हैं । तुम्हारा पूछा हुआ अर्थ मैंने कह दिया, इसलिये हे
अकारणमित्र, शीघ्रता से पर्यटन करते हुए तुम अपने अभीष्ट स्थान को जाओ और मैं भी अपनी
अभीष्ट-प्राप्ति तक तपश्चर्या में दृढता से संलग्न होता हूँ