Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 35–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 181, verses 35–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 35-37

संस्कृत श्लोक

हारीतहंसशुककोकिलकोककाकचक्राह्वभासकलविङ्ककुलाकुलाङ्गम् । भेरुण्डकुक्कुटकपिञ्जलहेमचूडराढामयूरबककल्पितकेलिरम्यम् ॥ ३५ ॥ गन्धर्वयक्षसुरसिद्धकिरीटघृष्टपादाजकर्णिककदम्वसरस्वतीकम् । वातायनं कनककोमलचम्पकौघताराम्बराम्बुधरपूरगृहीतगन्धम् ॥ ३६ ॥ मन्दानिलस्खलितपल्लववालवल्लीविन्यासगुप्तदिवसाधिपरश्मिशीतम् । पीतं कदम्बकरवीरकनालिकेरतालीतमालकुलपुष्पपरागपूरैः ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अभीप्सित वर देकर वह द्वितीय सूर्य-सा पुरुष जहाँ से उदित हुआ था उसी सूर्यमण्डल में अस्त होने के लिए प्रवेश कर गया । उस सूर्य -पुरुष के चले जाने पर मैंने शास्त्रों में जैसा सुना था वैसे ही श्रेष्ठ आदित्य पुरुष को जिसने प्रत्यक्ष देखा था ओर वरदानव्यवहार से अनुभव किया था ऐसे उस विवेकी शाखातपस्वी से कहा : हे ब्रह्मन्‌, वृक्षशाखा में लम्बायमान होकर जो आपने तपस्या की थी, उसका फल आपको प्राप्त हो गया, अब आप तप छोडकर यथाप्राप्त गृहगमनादि व्यापार करें