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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 182, Verses 32–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 182, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 182 · श्लोक 32-34

संस्कृत श्लोक

देव्युवाच । भर्त्रर्थमथ चात्मार्थे गृह्यतां बालिके वरः । चिरं क्लिष्टासि तपसा निदाघेनेव मञ्जरी ॥ ३२ ॥ इत्याकर्ण्य वचो देव्या दत्तपुष्पा चिरंटिका । स्ववासनानुसारेण कुर्वाणैवेश्वरीस्तवम् ॥ ३३ ॥ आनन्दमन्थरोवाच वचनं मृदुभाषिणी । आकाशसंस्थितां देवीं मयूरीवाभ्रमालिकाम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सज्जनों, जहाँ पर भ्रमरियों के मनोमोहक गीत विलासों से कोयल चंचल रहते थे, फूलों की वर्षा करनेवाले मेघ सदृश वृक्षों से आकाशरूपी चँदवे में सैकड़ों चन्द्रमा स्थित थे और कमल के पराग-कणों से दिगन्तराल व्याप्त रहते थे। जो मन्दार ओर कुन्द के मकरन्दं से (पुष्परसों) दिशाओं को सदा सुगन्धित करता था, जहाँ चारों ओर विकसित हो रही (खिल रही) पुष्पराशिरूपी चन्द्रबिम्बों में शोभा व्याप्त थी, सन्तानक (एक तरह का कल्पवृक्ष) के पुष्पस्तवकरूपी हास के विकास से जो अत्यन्त रमणीय था, जहाँ लतारूपी अंगनाएँ सुगन्धित वायु से पूर्ण रहती थीं, ऐसा यह गौरी-वन वसन्तऋतु का नगर- सा सुरम्य था, इसके भँवरों का गाना अपूर्व था, यह गुँजारकर रहीं भँवरियों से व्याप्त पुष्पराशि के मण्डपों से परिपूर्ण था, चन्द्रकिरणराशि के समान चारों ओर से कोमल फूलरूपी झूलों में देवांगनाएँ और सिद्धांगनाएँ यहाँ झूला झूलती थीं