Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
वरदात्मा गृहीतत्वाच्चित्कालान्तरसंभृता ।
यदा तदान्तःसारासौ दुर्जया न तु शापजा ॥ ३२ ॥
वरप्रदानं वरदैर्वरदानां वरार्थिभिः ।
यदा सुचिरमभ्यस्तं वराणां सारता तदा ॥ ३३ ॥
यदेव सुचिरं संविदभ्यस्यति तदेव सा ।
सारमेवाशु भवति भवत्याशु च तन्मयी ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
देवीजी ने कहा : हे पुत्रि, जैसे गर्मी से मंजरी
(बोर) चिरकालतक क्लेश पाती हे वैसे ही दीर्घं तपस्या से तुमने क्लेश पाया है अब तुम पति के
लिए ओर अपने लिए वरदान लो । देवी का उक्त वचन सुनकर देवी के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित
कर मृदुभाषिणी सौभाग्यवती वधूने मारे आनन्द के विह्नल होकर अपनी वासना के अनुसार भगवती
की स्तुति करते हुए जैसे आकाश में स्थित मेघमाला से मयूरी बोलती है वैसे ही आकाश मेँ स्थित
देवी से कहा