Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
शुद्धानामतिशुद्धैव संविज्जयति संविदाम् ।
अशुद्धानां त्वशुद्धैव कालात्साम्यं न विद्यते ॥ ३५ ॥
क्षणांशेनापि यो ज्येष्ठो न्यायस्तेनावपूर्यते ।
नार्थे न्यायान्तरं किंचित्कर्तुमुत्सहते मदम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
सुवासिनी ने (सौभाग्यवती ने) कहा : हे देवि, देवदेव भगवान् श्री शिवजी
के साथ जैसा आपका प्रेम है वैसा ही पतिदेव के साथ मेरा प्रेम हो और मेरे वे पतिदेव अमर हों ।
देवी ने कहा : भद्रे, आदि सृष्टि से लेकर चली हुई ईश्वराज्ञारूप नियति का भंग करना संभव न होने
के कारण तपस्या, दान आदि द्वारा अमरता प्राप्त नहीं की जा सकती, इसलिए हे सुव्रते, तुम दूसरा
कोई वर माँगो