Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 183, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 183, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 183 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मोवाच ।
सप्तद्वीपेश्वरवरा गृहरोधवराश्च हे ।
कामः संपन्न एवेह भवतां भवतामपि ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
वे शरीर सुख की कोई परवाह न कर अपने पुत्र की कल्याणकामना से प्रसिद्ध कलापग्राम
नामक तीर्थ को जाने के लिए प्रयत्नवान् हुए