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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

सर्वस्मिन्नेकसुघने ब्रह्मण्येव निरामये । का प्रवृत्तिर्निवृत्तिः का भावाभावादिवस्तुनः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

शापो ने वरो का वचन सुनकर “बहुत अच्छी बात है" यों उनकी सलाह मान ली। चाहे मूढ ही क्यों न हो, युक्तियुक्त वचन कौन न मानेगा ?