Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
एकस्यामेव निद्रायां सुषुप्तस्वप्नविभ्रमाः ।
यदा भान्त्यविचित्रायां चित्रा इव निरन्तराः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर शाप वरों
के साथ ब्रह्मलोक में जायेंगे । सदा ही सन्देह की निवृत्ति करने के लिए महानुभाव लोग ही शरण होते
हैं