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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 24–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 24–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

एतस्यां चित्खसत्तायां तथा मूलकसर्गकाः । बहवो भान्त्यचित्रायां चित्रा इव निरन्तराः ॥ २४ ॥ द्रव्ये द्रव्यान्तरं श्लिष्टं यत्कार्यान्तरमाक्षिपेत् । तद्वदन्तस्तथाभूतचित्सारं स्फुरणं मिथः ॥ २५ ॥ सर्वे पदार्थाश्चित्सारमात्रमप्रतिघाः सदा । यथा भान्ति तथा भान्ति चिन्मात्रैकात्मतावशात् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

वे ब्रह्माजी को प्रणाम कर आपस में जो तकरार हुई थी उसे सब ज्यो -की-त्यों कहेंगे उनका कथन सुनकर ब्रह्माजी कहेंगे