Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
स्वभाववाताधूतस्य जगज्जालचमत्कृतेः ।
हा चिन्मरीचिपांश्वभ्रनीहारस्य विसारिता ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
वरदाता की “मेने वर दिया" इस तरह स्थित जो
संवित् है वही वर-प्रार्थी में 'मैंने यह वर पाया" यों स्थित होती है