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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

विचित्राः खलु दृश्यन्ते चिज्जले स्पन्दरीतयः । हर्षामर्षविषादोत्थजङ्गमस्थावरात्मनि ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌, ये वर ओर शापरूप हम लोग सदा संविन्मयही हैं। हमारा स्वरूप संवित्‌ के सिवा दूसरा नहीं हे