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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

प्रवहत्येव नियतिर्नियतार्थप्रदायिनी । स्थावरं जङ्गमं चैव तिष्ठत्येव यथाक्रमम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

जब वर देनेवाले ओर वर प्रार्थी पुरुषों द्वारा वर देनेवालों के वरप्रदान का चिरकाल तक अभ्यास किया जाता है तब वरो की अन्तःसारता होती है॥ ३ ३॥ संवित्‌ जिसी का चिरकाल तक अभ्यास करती है तन्मयी वह शीघ्र हो जाती है ओर वही संसार हो जाता हे