Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
जायते जङ्गमं जीवात्स्थावरं स्थावरादपि ।
नियत्याधो वहत्यम्बु गच्छत्यूर्ध्वमथानलः ॥ ३५ ॥
वहन्ति देहयन्त्राणि ज्योतींषि प्रतपन्ति च ।
वायवो नित्यगतयः स्थिताः शैलादयः स्थिराः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्रीय होने के कारण शुद्ध संविदोंमें से अतिविशुद्ध जो संवित्
होती है वही सबसे प्रबल होती है लेकिन अशुद्ध संविदं में अशुद्ध ही प्रबल होती हे, इसलिए उनके फल
में भी तुल्यता नहीं हे