Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 40–44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verses 40–44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 40-44
संस्कृत श्लोक
तापस उवाच ।
अपूर्वं दृश्यते सर्वं स्वप्ने स्वमरणं यथा ।
प्राग्दृष्टं दृष्टमित्येव तत्रैवाभ्यासतः स्मृतिः ॥ ४० ॥
चित्त्वाच्चिद्व्योम्नि कचति जगत्संकल्पपत्तनम् ।
न सन्नासदिदं तस्माद्भाताभातं यतः स्वतः ॥ ४१ ॥
चित्प्रसादेन संकल्पस्वप्नाद्यद्यानुभूयते ।
शुद्धं चिद्व्योम संकल्पपुरं मा स्मर्यतां कथम् ॥ ४२ ॥
हर्षामर्षविनिर्मुक्तैर्दुःखेन च सुखेन च ।
प्रकृतेनैव मार्गेण ज्ञैश्चक्रैरिव गम्यते ॥ ४३ ॥
निद्राव्यपगमे स्वप्ननगरे यादृशं स्मृतौ ।
चिद्व्योमात्म परं विद्धि तादृशं त्रिजगद्भ्रमम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दृष्टि तिमिररोग के हट जाने पर
आकाश में भ्रान्तिकृत केशों का वर्तुलाकार गोला कहीं चला जाता है वैसे ही स्वयं ही वृथा आयास
करनेवाले अपनी मूर्खता प्रकट करनेवाले अपने को लज्जा से शाप देनेवाला वह शापगण यह कहकर
कहीं चला गया । इस प्रकार दुर्वासाजी के शापों के चले जाने पर सप्तद्वीपाधिपता के विरुद्ध घर से
निर्गमन निरोधक उनकी भार्याओं को गौरी द्वारा दिये गये वरसंघ ने जैसे वैयाकरण-प्रक्रिया में आदेश
स्थानी के स्थान की पूर्ति करता है वैसे ही शापों के स्थान की पूर्ति की । शापों के स्थानों पर बैठे हुए वर
ब्रह्माजी से कहेंगे : हे देवाधिदेव, अन्धे कुओं से जलों के बाहर निर्गमन की तरह सप्तद्वीपों के अधिपति
जीवों का शव गृह से बाहर निकलना हम नहीं जानते हैं, कारण कि उनका बाहर निर्गमन हम लोगों द्वारा
अवरुद्ध है। ये श्रेष्ठ वीर वर इन सप्त द्वीपेश्वरों को गृहरूपी द्वीपों में रण में दिग्विजय कराते हैं। हे
देवाधिदेव, इसलिए इस तरह अनिवार्य इस विरोध में जो हमें करना चाहिये उसका हमारे कल्याण के
लिए हमें आदेश दीजिये