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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 184, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

संविदाभासमात्रं यज्जगदित्यभिशब्दितम् । तत्संविद्व्योम संशान्तं केवलं विद्धि नेतरत् ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी ने कहा : हे सप्तद्वीपेश्वर बनानेवाले वरों, और हे घर में रोकनेवाले वरों, आप सब लोगों की अभिलाषा पूर्ण हो गई है