Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 185, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 185, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 185 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यद्यद्यदा वस्तु यथोदितात्म भातीह भूतैरनुभूयते च ।
तत्तत्तदा सर्वघनस्तथास्ते ब्रह्मेत्थमाद्यन्तविमुक्तमस्ति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उनकी स्थिति भी संवित् के अनुसार ही है। स्पन्दशून्य चिदाधिष्ठानवाली होने के कारण सब
द्रव्यशक्तियाँ भी अपने आश्रय से विचलित नहीं होतीं और न उनका हास ही होता है, ऐसा कहते हैं।
एकमात्र चिन्मात्रस्वरूप होने के कारण संविद् के अनुसार स्थित, निश्चल तथा द्वैताकार के ग्रहण
से रहित द्रव्यशक्तियाँ स्फुरित होती हैं